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सूरह यूनुस 10:15–17
“कोई दूसरा क़ुरआन लाओ”: समझौते की माँग और नबी ﷺ की चालीस साला ज़िंदगी की गवाही
“Bring Another Qur’an”: The Demand for Compromise and the Witness of the Prophet’s ﷺ Forty Years
Introduction (English) These verses record one of the most revealing demands the Quraysh made of the Prophet ﷺ: change the Qur’an, or bring another one in its place. In his commentary, Maulana Mawdudi shows what lay behind this demand, which was a bid for religious compromise on a give-and-take basis. He then draws out the Qur’an’s powerful reply. The Prophet’s forty years of open, blameless life among his own people stand as living proof that the Qur’an was not his own composition.
भूमिका (हिन्दी) ये आयतें क़ुरैश की उस माँग को बयान करती हैं जो उनकी असल सोच को खोलकर रख देती है: क़ुरआन को बदल दो, या उसकी जगह कोई दूसरा क़ुरआन ले आओ। मौलाना मौदूदी अपनी व्याख्या में बताते हैं कि इस माँग के पीछे लेन-देन के आधार पर धार्मिक समझौते की कोशिश छिपी थी। फिर वे क़ुरआन के उस ज़बरदस्त जवाब को सामने लाते हैं जो नबी ﷺ की अपनी क़ौम के बीच गुज़री चालीस साला खुली और बेदाग़ ज़िंदगी को इस बात का जीता-जागता सबूत बनाता है कि क़ुरआन उनकी अपनी रचना नहीं है।
[15-17] जब उन्हें हमारी साफ़-साफ़ आयतें सुनाई जाती हैं, तो वे लोग जो हमसे मिलने की उम्मीद नहीं रखते, कहते हैं, “इसके बजाय कोई और क़ुरआन लाओ, या इसमें कुछ फेर-बदल करो।”¹⁹ ऐ मुहम्मद! उनसे कहो, “मेरा यह काम नहीं कि अपनी ओर से इसमें कोई परिवर्तन कर लूँ। मैं तो केवल उस वह्य का पालन करता हूँ जो मेरी ओर भेजी जाती है। अगर मैं अपने रब की नाफ़रमानी करूँ तो मुझे एक भयानक दिन के अज़ाब का डर है।”²⁰ और यह भी कहो, “अगर अल्लाह चाहता तो मैं यह क़ुरआन तुम्हें कभी न सुनाता, और न तुम्हें (इसके बारे में) कुछ बताता। मैं इसके उतरने से पहले एक उम्र तुम्हारे बीच गुज़ार चुका हूँ। क्या तुम अक़्ल से काम नहीं लेते?²¹ फिर उससे बड़ा पापी कौन होगा जो ख़ुद एक झूठ गढ़कर उसे अल्लाह से जोड़ दे, या उसकी सच्ची आयतों को झुठलाए?²² यक़ीनन अपराधी कभी (सच्ची) सफलता नहीं पा सकते।”²³
टिप्पणी 19 यह बात कहकर वे दो बातें जताना चाहते थे। पहली यह कि मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) जिसे ईश्वरीय वह्य कहकर पेश कर रहे हैं, वह वास्तव में उनके अपने दिमाग़ की उपज है। वे बस अपनी बात को वज़नदार बनाने के लिए उसे अल्लाह से जोड़ रहे हैं।
दूसरी बात यह थी: “अगर तुम अपनी क़ौम के नेता बनना चाहते हो, तो कोई ऐसी चीज़ पेश करो जिससे दुनिया में उनकी ख़ुशहाली हो। तौहीद, आख़िरत और उन नैतिक पाबंदियों को छोड़ दो जो तुम अपनी शिक्षा में लगा रहे हो। और अगर यह मुमकिन न हो, तो क़ुरआन में कुछ संशोधन कर दो, ताकि लेन-देन के उसूल पर तुम्हारे और हमारे बीच समझौता हो जाए। तुम्हारी तौहीद में हमारे शिर्क के लिए कुछ गुंजाइश निकल आए, हमारी मनमानी के लिए भी, और इस बात के लिए भी कि हम दुनिया में चाहे जो करें, आख़िरत में हमारी नजात हो जाए। यह भी अच्छी तरह समझ लो कि हम तुम्हारी सम्पूर्ण नैतिकता स्वीकार नहीं कर सकते। इसलिए तुम्हें हमारे पूर्वाग्रहों, हमारी रस्मों-रिवाजों, हमारे निजी और क़ौमी हितों और हमारी इच्छाओं के लिए छूट रखनी होगी। हमारा प्रस्ताव है कि आपसी सहमति से उन धार्मिक माँगों की एक सूची बना ली जाए जो अल्लाह के हक़ अदा करने के लिए हम पर अनिवार्य हों। उसके आगे हम अपने दुनियावी मामले जैसे चाहें चलाने के लिए आज़ाद रहें। यह समझौता इसलिए ज़रूरी है कि हम तुम्हारी यह माँग नहीं मान सकते कि इंसानी ज़िंदगी अपने हर पहलू में पूरी तरह तौहीद और आख़िरत के अक़ीदों के तक़ाज़ों और इस्लामी जीवन-व्यवस्था के नियमों के अनुसार गुज़ारी जाए।”
टिप्पणी 20 यह ऊपर बयान की गई दोनों माँगों का जवाब है: “मुझे इस किताब में कोई फेर-बदल करने का अधिकार नहीं है, क्योंकि मैं इसका लेखक नहीं हूँ। अल्लाह है जो इसे मुझ पर उतार रहा है। इसलिए इसमें किसी समझौते का सवाल ही नहीं उठता। अगर तुम इसके रास्ते को अपनाना चाहते हो तो इसे जैसा है वैसा ही स्वीकार करना होगा, वरना तुम इसे ठुकराने के लिए आज़ाद हो।”
टिप्पणी 21 यह उनके इस आरोप के ख़िलाफ़ एक बहुत ठोस दलील है कि मुहम्मद (सल्ल.) ख़ुद क़ुरआन के लेखक हैं मगर उसे अल्लाह से जोड़ रहे हैं। साथ ही यह नबी (सल्ल.) के इस दावे का समर्थन करती है कि यह किताब अल्लाह की ओर से, जो इसका असल रचयिता है, उन पर उतारी जा रही है। दलील यह है: “तुम ख़ुद नुबूवत से पहले की उनकी चालीस साला ज़िंदगी के गवाह हो। वे तुम्हारे ही शहर में पैदा हुए, और उन्होंने अपना बचपन, जवानी और अधेड़ उम्र तुम्हारी आँखों के सामने गुज़ारी। वे तुम्हारे बीच रहे और तुमसे हर तरह के सामाजिक, वैवाहिक और आर्थिक संबंध रखे, यहाँ तक कि उनकी ज़िंदगी का कोई पहलू तुमसे छिपा न था। क्या तुमने उनकी पूरी ज़िंदगी में कोई ऐसी चीज़ देखी जिससे लगे कि वे इस किताब के लेखक हो सकते हैं? क्या तुम अक़्ल से काम नहीं लेते?”
क़ुरआन में उठाए गए इस सवाल में नबी (सल्ल.) के बारे में दो बातें निहित थीं, जिन्हें मक्का का हर व्यक्ति अच्छी तरह जानता था।
पहली यह कि नुबूवत से पहले की अपनी चालीस साला ज़िंदगी में उन्होंने न कोई शिक्षा प्राप्त की थी, न कोई प्रशिक्षण। वे किसी ऐसी संगत में भी नहीं बैठे थे जो उन्हें ऐसी किताब का लेखक बना सकती, जो ऐसी अनोखी बातों से भरी थी जिनसे उनके आसपास के लोग अनजान थे। किसी ने भी उनसे उन विषयों के बारे में कभी कुछ नहीं सुना था जिन पर क़ुरआन की विभिन्न सूरतों में चर्चा की गई है। यहाँ तक कि उनके किसी रिश्तेदार या क़रीबी दोस्त ने भी, चालीस वर्ष की उम्र में नुबूवत का महान दावा करने से पहले, उनकी बातचीत में या उनकी किसी और बात में ऐसा कुछ नहीं देखा था जिससे इस दिशा में किसी क्रमिक विकास के संकेत मिलते हों। यह इस बात का खुला प्रमाण था कि क़ुरआन उनके अपने दिमाग़ की उपज नहीं है, बल्कि ज़रूर बाहर से उन पर उतारा गया है। किसी इंसान के लिए यह असंभव है कि वह अपनी पिछली ज़िंदगी में इसके विकास का कोई संकेत दिखाए बिना, अचानक ऐसी चीज़ पेश कर दे। यही कारण है कि जब मक्का के कुछ समझदार लोगों ने इस आरोप का बेतुकापन महसूस किया, तो वे कहने लगे कि कोई दूसरा व्यक्ति उन्हें ये बातें सिखाता है। लेकिन यह बात पहली से भी ज़्यादा बेतुकी थी। मक्का तो क्या, पूरे अरब में वे किसी एक व्यक्ति की भी निशानदेही नहीं कर सकते थे जिसमें क़ुरआन जैसी अनोखी बातें पेश करने की क्षमता हो। वे यह भी जानते थे कि इतनी ऊँची क़ाबिलियत का व्यक्ति चालीस साल तक किसी अनजान कोने में गुमनाम नहीं रह सकता था।
दूसरी बात, जिसने उनकी ज़िंदगी के उन चालीस वर्षों को विशिष्ट बनाया था, उनका उच्च चरित्र था, नकारात्मक और सकारात्मक दोनों पहलुओं से। उनके बारे में कभी यह नहीं सुना गया कि उन्होंने एक भी झूठ बोला हो, या किसी भी रूप में धोखा, जालसाज़ी, चालबाज़ी या मक्कारी की हो। इसके विपरीत, जिस किसी का भी किसी भी हैसियत से उनसे वास्ता पड़ा था, वह इस बात का गवाह था कि वे बिना किसी दाग़ के सच्चे, ईमानदार और अमानतदार थे।
उदाहरण के तौर पर एक बहुत मशहूर ऐतिहासिक घटना पेश की जा सकती है। नुबूवत से केवल पाँच साल पहले बारिश से काबा को नुक़सान पहुँचा। जब उसका पुनर्निर्माण हो रहा था, तो क़ुरैश के विभिन्न क़बीलों में झगड़ा उठ खड़ा हुआ कि हजरे-अस्वद (काला पत्थर) को उसकी जगह पर रखने का सम्मान किसे मिले। अतः यह तय हुआ कि अगली सुबह जो व्यक्ति सबसे पहले हरम में दाख़िल होगा, वही इस झगड़े का फ़ैसला करेगा। अगली सुबह सबसे पहले हरम में दाख़िल होने वाले मुहम्मद (सल्ल.) थे। इस पर सब लोग ख़ुशी से पुकार उठे, “यह तो पूरी तरह अमानतदार व्यक्ति हैं, हम इनसे पूरी तरह संतुष्ट हैं; यह मुहम्मद हैं।” इस तरह अल्लाह ने उन्हें अपना रसूल नियुक्त करने से पहले क़ुरैश की उस बड़ी सभा से यह गवाही दिलवाई कि वे “अल-अमीन” (अमानतदार) हैं। इसलिए किसी के पास इसका कोई औचित्य नहीं था कि जिस व्यक्ति ने अपनी पूरी ज़िंदगी में न कभी झूठ बोला, न जालसाज़ी की, न चालबाज़ी, उस पर यह आरोप लगाए कि वह अपनी साहित्यिक रचना को झूठे तौर पर अल्लाह से जोड़ रहा है और पूरी दृढ़ता से बार-बार इसे ईश्वरीय बता रहा है।
यही कारण है कि अल्लाह ने अपने रसूल से कहा कि वे उनके बेतुके आरोप का खंडन मानो केवल इतना कहकर करें: “ऐ मेरी क़ौम के लोगो! यह बेतुका आरोप लगाने से पहले अक़्ल से काम लो। मैं तुम्हारे बीच कोई अजनबी या परदेसी नहीं हूँ। अल्लाह की ओर से वह्य पाने का दावा करने से पहले मैं चालीस साल की एक उम्र तुम्हारे बीच गुज़ार चुका हूँ। मेरे अतीत को देखते हुए तुम कैसे यह उम्मीद कर सकते हो कि मैं अल्लाह से ज्ञान पाए बिना और उसके आदेश के बिना क़ुरआन को अल्लाह की किताब के रूप में तुम्हारे सामने पेश करूँगा?” (अधिक विवरण के लिए देखें सूरह अल-क़सस, टिप्पणी 109।)
टिप्पणी 22 अर्थात्, “अगर ये आयतें अल्लाह की ओर से नहीं हैं और मैं ख़ुद इन्हें गढ़कर उसकी ओर से वह्य के रूप में पेश करता हूँ, तो मुझसे बड़ा पापी कोई नहीं हो सकता। और अगर ये आयतें सचमुच अल्लाह की ओर से हैं और तुम इन्हें झुठला रहे हो, तो तुमसे बड़ा पापी कोई नहीं हो सकता।”
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Chapter younus vs 15,16&17. Arguments to compromise or change or bring another Quran